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Tuesday, 1 July 2014

वह डूब गया सूरज व्याकुल

 
 
दिन भर सरस किरणे बिखेर 
भू को दे नूतन उजियाली 
भोला सा आया था भूधर
 वह पीने शबनम की प्याली 
 
उषा ने उसके स्वागत में 
खग गाये थे तरु पर कुल कुल 
 
आया था वह भूधर उषा के 
साथ प्रणय में बंध जाने 
पर हो न सकी यह बात , लगा 
वह गीत विरह का ही गाने 
 
कलियों साम्लान आमुख जो 
मुस्कान दिखाता था उत्फुल्ल 
 
यह लाख मनाती धरा , पर 
चुप न हो सका वह छण भर 
संध्या होते होते आखिर 
चीत्कार उठा सहसा अम्बर 
 
वह चला गया , ले गया साथ 
अपनी अपनी किरणे मंजुल 
 
 

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