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Sunday, 25 May 2014

तुम कहो 

तुम कहो प्रिय ! राग में रागिनी कैसे समाऊँ
छिन्न हैं  सब तार बेसुध , मन कहो कैसे सजाऊँ !!!

जो  रिझा दे मन को तेरे , गीत वह कैसे मैं गाऊँ
पा गई यदि स्वर कदाचित , पर उन्हें कैसे सुनाऊँ
दूर से क्यूँ आ रही फिर , फिर कोई आवाज़ घायल
छनछनाते घुंघरुओं की खनक है,  या कोई पायल
जर्रे जर्रे में बसी है,  सुवास कहो कैसे भुलाऊँ
भ्रमित चकली सी चकित हूँ , तुम्ही कहो कैसे मैं आऊँ
वन विपिन में डोलती अनभिज्ञ अपनी ही तृषा से तृषित सी
शुष्क होठों के संस्पर्श से अतृप्त ह्रदय की प्यास मैं कैसे बुझाऊं 

जो  रिझा दे मन को तेरे , गीत वह कैसे मैं गाऊँ।।।।।

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