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Sunday, 25 May 2014

इन्सान 

अगर इंसान सच्चे अर्थ में इंसान हो जाए
तो फिर पहचान कर खुद को , वही भगवान हो जाए
खुदा खुद ही है यह इतना जान भर ले जो
अगर खुद को भुला बैठे तो वो शैतान हो जाए

चलन बदला बंधा इंसा , ;चलन सुधरे तो बन जाए
बंधा भी आप है इंसा , अगर चाहे तो खुल जाए
ज्यो मकड़ी बन के जाला उसमे खुद ही फंस जाए
यूँ अपनी वासनाओं में इंसा आप ही बांध जाए

गुनाहों के बवंडर से ढका  है प्रेम का सूरज
अगर ये धूल धुल जाए तो पैदा नूर हो जाए
फ़रिश्ते तक कदम छूते  हैं आकर ऐसे इंसा के
जो देहि के बरसते रूप रस में लीन हो जाए
जो अपनी आत्मा आनंद में यूँ मसरूर हो जाए   

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