प्रिय तुम्हारे किस सजीले स्वप्न की साकार हूँ मैं
कौन सी तस्वीर खींची , कौन सा आकार हूँ मैं
जो बसी हिय में तुम्हारे , बस वही श्रृंगार हूँ मैं
एक ही थी दृष्टि जिसमे , सृष्टि थी मेरी समाई
दीप्ती सी थी वही मुस्कान स्मित मन में मेरे जगमगाई
मोह के जंजाल में फंसी डूब कर तरती उबरती
टूट कर जो नित्य बजती, मन वीणा का का तार हूँ मैं
प्रिय तुम्हारे किस सजीले स्वप्न की साकार हूँ मैं
कौन से वो पल थे बीते अनुराग में भी राग बाँधे
वक़्त रीता समय बीता शब्दों ने भी राह दिखाई
जीवन के पथ पर ज्योति बनकर अन्धकार को दूर कर रौशनी दिखाई
फूल जो तुमने बिछाये वक़्त ने थे वे सुखाये
सूखकर भी जो ह्रदय पर खिल रहा वह हार हूँ मैं
प्रिय तुम्हारे किस सजीले स्वप्न की साकार हूँ मैं
कौन सी तस्वीर खींची , कौन सा आकार हूँ मैं
जो बसी हिय में तुम्हारे , बस वही श्रृंगार हूँ मैं
एक ही थी दृष्टि जिसमे , सृष्टि थी मेरी समाई
दीप्ती सी थी वही मुस्कान स्मित मन में मेरे जगमगाई
मोह के जंजाल में फंसी डूब कर तरती उबरती
टूट कर जो नित्य बजती, मन वीणा का का तार हूँ मैं
प्रिय तुम्हारे किस सजीले स्वप्न की साकार हूँ मैं
कौन से वो पल थे बीते अनुराग में भी राग बाँधे
वक़्त रीता समय बीता शब्दों ने भी राह दिखाई
जीवन के पथ पर ज्योति बनकर अन्धकार को दूर कर रौशनी दिखाई
फूल जो तुमने बिछाये वक़्त ने थे वे सुखाये
सूखकर भी जो ह्रदय पर खिल रहा वह हार हूँ मैं
प्रिय तुम्हारे किस सजीले स्वप्न की साकार हूँ मैं
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