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Sunday, 25 May 2014

तुम कहो 

तुम कहो प्रिय ! राग में रागिनी कैसे समाऊँ
छिन्न हैं  सब तार बेसुध , मन कहो कैसे सजाऊँ !!!

जो  रिझा दे मन को तेरे , गीत वह कैसे मैं गाऊँ
पा गई यदि स्वर कदाचित , पर उन्हें कैसे सुनाऊँ
दूर से क्यूँ आ रही फिर , फिर कोई आवाज़ घायल
छनछनाते घुंघरुओं की खनक है,  या कोई पायल
जर्रे जर्रे में बसी है,  सुवास कहो कैसे भुलाऊँ
भ्रमित चकली सी चकित हूँ , तुम्ही कहो कैसे मैं आऊँ
वन विपिन में डोलती अनभिज्ञ अपनी ही तृषा से तृषित सी
शुष्क होठों के संस्पर्श से अतृप्त ह्रदय की प्यास मैं कैसे बुझाऊं 

जो  रिझा दे मन को तेरे , गीत वह कैसे मैं गाऊँ।।।।।
इन्सान 

अगर इंसान सच्चे अर्थ में इंसान हो जाए
तो फिर पहचान कर खुद को , वही भगवान हो जाए
खुदा खुद ही है यह इतना जान भर ले जो
अगर खुद को भुला बैठे तो वो शैतान हो जाए

चलन बदला बंधा इंसा , ;चलन सुधरे तो बन जाए
बंधा भी आप है इंसा , अगर चाहे तो खुल जाए
ज्यो मकड़ी बन के जाला उसमे खुद ही फंस जाए
यूँ अपनी वासनाओं में इंसा आप ही बांध जाए

गुनाहों के बवंडर से ढका  है प्रेम का सूरज
अगर ये धूल धुल जाए तो पैदा नूर हो जाए
फ़रिश्ते तक कदम छूते  हैं आकर ऐसे इंसा के
जो देहि के बरसते रूप रस में लीन हो जाए
जो अपनी आत्मा आनंद में यूँ मसरूर हो जाए   
गीत 

अनेकों  प्रश्न ऐसे हैं जो दुहराये नही जाते
मगर उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते
अभावों का सदा स्वागत इसलिए किआ मैंने
की घर आये हुए मेहमाँ लौटाए नहीं जाते
हुआ क्या आँख से आंसू अगर बाहर नहीं निकले
ये मर्म के गीत हैं , सदा गाये नहीं  जाते …