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Tuesday, 1 July 2014

वह डूब गया सूरज व्याकुल

 
 
दिन भर सरस किरणे बिखेर 
भू को दे नूतन उजियाली 
भोला सा आया था भूधर
 वह पीने शबनम की प्याली 
 
उषा ने उसके स्वागत में 
खग गाये थे तरु पर कुल कुल 
 
आया था वह भूधर उषा के 
साथ प्रणय में बंध जाने 
पर हो न सकी यह बात , लगा 
वह गीत विरह का ही गाने 
 
कलियों साम्लान आमुख जो 
मुस्कान दिखाता था उत्फुल्ल 
 
यह लाख मनाती धरा , पर 
चुप न हो सका वह छण भर 
संध्या होते होते आखिर 
चीत्कार उठा सहसा अम्बर 
 
वह चला गया , ले गया साथ 
अपनी अपनी किरणे मंजुल 
 
 

तुम पर मुझको विश्वास नहीं

तुम पर मुझको  विश्वास नहीं ……

मैं  रोता हूँ अपने घर में 
तू डाल डाल पर गाती है 
मैं  घाव ह्रदय के सहलाता 
तू उस पर नमक गिराती है

सुखमय यौवन पा तू हंसती 
तुझको जीने की आस नहीं 

मैं प्यासा पनघट पर मरता 
तू बहती शत शत धारों में 
रो रो कर मैं आँहें भरता 
तू खोई मौन विचारों में 

रुक कर सुन ले गाथा मेरी 
तुझको इतना अवकाश नहीं 

मैं सिसक सिसक मरता निशि में 
तुम नभ में आकर इठलाती  
मैं मौत मांगता प्रभु से तुम 
तुम तारों के संग मिलकर गाती 
 
तूम  करते अट्टहास रह रह कर 
मेरे अधरों पर हास नहीं 

ऐ पवन मुझे क्या कहते हो

जितने चंचल हो तुम उससे
क्या काम चंचल मेरा जीवन है
जितना दुखमय हो तुम उससे
क्या किंचित भी कम मेरा मन है

 दुःख में सब हैं एक तुम भी हो
जो कभी कभी पीड़ा सहते हो

कल जिन कलियों के अंक बीच
लेकर तुमने दुलराया था
कल जिन सुमनों की डाल डाल पर
हंसकर जी बहलाया था

वे अब ना रहे तो क्यों उनकी
चिंता में यूँ रोते रहते हो

यह व्यथा ईश्वर दान जगत में
जन जन को सब जड़ चेतन को
सबके  जीवन में एक बार, मुस्कान
रुदन भी कातर मन को
मत हो अधीर सब दर्द सहो
यह प्रश्न नहीं तुम क्यों दहते हो। …
 

Monday, 23 June 2014

सार्थक जीवन मंत्र

आनंद से जियो , हर सांस प्रति श्वांस
क्यूँ लेती  हो उष्ण उसाँस
कृष्णा को जपो ,  भगवत गीता का  आधार ले
जीवन के सार तत्व को समझो
कर्म रथ पर आरूढ़ रहो
ईश्वर को लगे सार्थक तुम्हारा सृजन
और संसार को याद रहे
एक रौशनी थी
अन्यत्र को
रोशन करने चली गई ....... 

सार्थक जीवन मंत्र
 असंतुलित और भयभीत मन
कथनी में करनी को छिपा लेता है
लेकिन करनी छिप नहीं पाती
और फिर कथनी
धीरे धीरे
व्यक्ति को अविश्वसनीय बना देती है
कथनी और करनी का महत्व
अलग अलग है
दोनों में साम्य होना
जीवन को सार्थक बना देता है
 सार्थक न हुआ
तो जन्म धारण ही
निरर्थक हो जात्ता है
संसार को समझने के लिए
सच कहने का साहस
होना ही चाहिए
विवेक होता  सब में है
उसे प्रयत्नपूर्वक
पहचान ने की आवश्यकता होती है
आत्मा तक पहुँचने का
एक रास्ता
विवेक से होकरजाता है
जो कुछ विवेक पूर्वक
किआ जाएगा
उसे कहने में भी
विवेक रहेगा  ही
फिर कभी
 कथनी और करनी में 
अंतर न होगा
कथनी और करनी की एकरूपता
प्रेम और विश्वास को जन्म देती है
अपनेप्रति
और दूसरों के प्रति भी
सच्चे , सार्थक और संतुलित
जीवन का यही मंत्र है।
 

स्वप्न की साकार हूँ मैं

प्रिय तुम्हारे किस सजीले  स्वप्न की साकार हूँ मैं
कौन सी तस्वीर खींची , कौन सा आकार हूँ  मैं
जो बसी हिय में तुम्हारे , बस वही श्रृंगार हूँ मैं

एक ही थी दृष्टि जिसमे , सृष्टि थी मेरी समाई
दीप्ती सी थी वही मुस्कान स्मित मन में मेरे जगमगाई
मोह के  जंजाल में फंसी डूब कर तरती  उबरती
टूट कर जो नित्य बजती,  मन वीणा का का तार हूँ मैं

प्रिय तुम्हारे किस सजीले स्वप्न की साकार हूँ  मैं

कौन से वो पल थे बीते अनुराग में भी राग बाँधे
वक़्त रीता समय बीता शब्दों ने भी राह दिखाई
जीवन के पथ पर ज्योति बनकर अन्धकार को दूर कर रौशनी दिखाई
फूल जो  तुमने बिछाये वक़्त ने थे वे सुखाये
सूखकर भी जो ह्रदय पर खिल रहा वह हार हूँ मैं

प्रिय तुम्हारे किस सजीले स्वप्न की साकार हूँ मैं

 

Sunday, 25 May 2014

तुम कहो 

तुम कहो प्रिय ! राग में रागिनी कैसे समाऊँ
छिन्न हैं  सब तार बेसुध , मन कहो कैसे सजाऊँ !!!

जो  रिझा दे मन को तेरे , गीत वह कैसे मैं गाऊँ
पा गई यदि स्वर कदाचित , पर उन्हें कैसे सुनाऊँ
दूर से क्यूँ आ रही फिर , फिर कोई आवाज़ घायल
छनछनाते घुंघरुओं की खनक है,  या कोई पायल
जर्रे जर्रे में बसी है,  सुवास कहो कैसे भुलाऊँ
भ्रमित चकली सी चकित हूँ , तुम्ही कहो कैसे मैं आऊँ
वन विपिन में डोलती अनभिज्ञ अपनी ही तृषा से तृषित सी
शुष्क होठों के संस्पर्श से अतृप्त ह्रदय की प्यास मैं कैसे बुझाऊं 

जो  रिझा दे मन को तेरे , गीत वह कैसे मैं गाऊँ।।।।।
इन्सान 

अगर इंसान सच्चे अर्थ में इंसान हो जाए
तो फिर पहचान कर खुद को , वही भगवान हो जाए
खुदा खुद ही है यह इतना जान भर ले जो
अगर खुद को भुला बैठे तो वो शैतान हो जाए

चलन बदला बंधा इंसा , ;चलन सुधरे तो बन जाए
बंधा भी आप है इंसा , अगर चाहे तो खुल जाए
ज्यो मकड़ी बन के जाला उसमे खुद ही फंस जाए
यूँ अपनी वासनाओं में इंसा आप ही बांध जाए

गुनाहों के बवंडर से ढका  है प्रेम का सूरज
अगर ये धूल धुल जाए तो पैदा नूर हो जाए
फ़रिश्ते तक कदम छूते  हैं आकर ऐसे इंसा के
जो देहि के बरसते रूप रस में लीन हो जाए
जो अपनी आत्मा आनंद में यूँ मसरूर हो जाए   
गीत 

अनेकों  प्रश्न ऐसे हैं जो दुहराये नही जाते
मगर उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते
अभावों का सदा स्वागत इसलिए किआ मैंने
की घर आये हुए मेहमाँ लौटाए नहीं जाते
हुआ क्या आँख से आंसू अगर बाहर नहीं निकले
ये मर्म के गीत हैं , सदा गाये नहीं  जाते …