दिन भर सरस किरणे बिखेर
भू को दे नूतन उजियाली
भोला सा आया था भूधर
वह पीने शबनम की प्याली
उषा ने उसके स्वागत में
खग गाये थे तरु पर कुल कुल
आया था वह भूधर उषा के
साथ प्रणय में बंध जाने
पर हो न सकी यह बात , लगा
वह गीत विरह का ही गाने
कलियों साम्लान आमुख जो
मुस्कान दिखाता था उत्फुल्ल
यह लाख मनाती धरा , पर
चुप न हो सका वह छण भर
संध्या होते होते आखिर
चीत्कार उठा सहसा अम्बर
वह चला गया , ले गया साथ
अपनी अपनी किरणे मंजुल